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कल्पना दत्त : अंग्रजों का डटकर सामना करने वाली “वीर महिला”

कल्पना दत्त देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाली महिला क्रांतिकारी में से एक थीं। उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंज़ाम देने के लिए क्रांतिकारी सूर्यसेन के दल से नाता जोड़ लिया था।

साल 1933 में कल्पना दत्त पुलिस से मुठभेड़ होने पर गिरफ्तार कर ली गईं थीं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रयत्नों से ही वह जेल से बाहर आ पाई थी। अपने महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए कल्पना दत्त को वीर महिला की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

कल्पना दत्त : अंग्रजों का डटकर सामना करने वाली "वीर महिला"

जन्म तथा क्रांतिकारी गतिविधियां

कल्पना दत्त का जन्म 27 जुलाई, 1913 को चटगांव के श्रीपुर गांव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। चटगांव में आरंभिक शिक्षा के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता अाई। प्रसिद्ध क्रांतिकारियों की जीवनियां पढ़कर वह प्रभावित हुई और शीघ्र ही खुद भी कुछ करने के लिए आतुर हो उठीं।

18 अप्रैल, 1930 को चटगांव शस्त्रागार लूट की घटना होते ही कल्पना दत्त कोलकाता से वापस चटगांव चली गईं और क्रांतिकारी सूर्यसेन के दल से संपर्क कर लिया। वह देश बदलकर इन लोगों को गोला-बारूद आदि पहुंचाया करती थीं। इस बीच उन्होंने निशाना लगाने का भी अभ्यास किया।

कारावास की सजा

कल्पना और उनके साथियों ने क्रांतिकारियों का मुकदमा सुनने वाली अदालत के भवन को और जेल की दीवार उड़ाने की योजना बनाई। लेकिन पुलिस को सूचना मिल जाने के कारण इस पर अमल नहीं हो सका। पुरुष वेश में घूमती कल्पना दत्त गिरफ्तार कर ली गईं, पर अभियोग सिद्ध न होने के कारण उन्हें छोड़ दिया गया। लेकिन कल्पना पुलिस को चकमा देकर घर से निकलकर क्रांतिकारी सूर्यसेन से जा मिलीं।

गिरफ्तार कर लिए गए और मई, 1933 में कुछ समय तक पुलिस और क्रांतिकारियों के बीच सशस्त्र मुकाबला होने के बाद कल्पना दत्त भी गिरफ्तार हो गईं। मुकदमा चला और फरवरी, 1933 में सूर्यसेन तथा तारकेश्वर दस्तिकार को फांसी की और 21 वर्ष की कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा हो गई।

रिहाई तथा सम्मान

साल 1937 में जब पहली बार प्रदेशों में भारतीय मंत्रिमंडल बने तब महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि के विशेष प्रयत्नों से कल्पना जेल से बाहर आ सकीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की।

वह कम्युनिस्ट पार्टी में सम्मिलित हो गई और 1943 में उनका कम्युनिस्ट नेता पूरन चंद जोशी से विवाह हो गया और वह कल्पना जोशी बन गई। बाद में कल्पना बंगाल से दिल्ली आ गई और इंडो सोवियत सांस्कृतिक सोसाइटी में काम करने लगीं। सितम्बर, 1979 में कल्पना जोशी को पुणे में वीर महिला की उपाधि से सम्मानित किया गया।

कल्पना दत्त का स्वर्गवास 8 फरवरी, 1995 में कोलकाता के पश्चिम बंगाल में हुआ।

Written by – Ansh Sharma

Avinash Kumar Singh

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