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नानी के प्रति पति का लगाव देख पत्नी ने दिव्यांगों के लिए स्नातक, स्नातकोत्तर व बीएड तक निशुल्क की शिक्षा

कहते हैं भगवान ने वैसे तो सब को एक समान बनाया लेकिन कुछ कमियां व्यक्ति को जन्म से ही मिलती है। जिसे व्यक्ति अपनी बदकिस्मती मान लेता है तो वहीं इस कमी को व्यक्ति अपनी सबसे बड़ी ताकत बना कर दुनिया की मिसाल बन जाता है।

परंतु एक व्यक्ति का अपनी नेत्री नानी के प्रति लगाव देख दिव्यांगों की सेवा करने के भाव ने पत्नी को इतना अभिप्रेरित किया कि पत्नी सुमन शर्मा ने न केवल शादी के बाद स्नातक, स्नातकोत्तर के अलावा विशेष बीएड की बल्कि दिव्यांग बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा के लिए एक निजी स्कूल ही खोल दिया।

जानकारी के मुताबिक अभी उक्त स्थान पर केवल फिलहाल 50 दिव्यांग बच्चे पढ़ाई कर रहे है। पत्नी द्वारा उठाए गए इस अथक और सराहनीय कार्य मे विजय शर्मा ने भी अपना भरपूर सहयोग किया।

जिनके स्कूल का नाम है आस्था स्पेशल स्कूल। उक्त स्कूल की संचालिका एवं प्रिंसिपल सुमन शर्मा बताती है कि उनका विवाह भिवानी निवासी शिक्षक विजय शर्मा से हुआ था। जो समय उनका विवाह हुआ था उनकी शिक्षा केवल मात्र दसवीं तक थी।

उन्होंने बताया कि उनके पति विजय शर्मा शुरुआत से ही दिव्यांग बच्चों के लिए काम करते थे। वह बाढड़ा के एक सरकारी स्कूल में विशेष शिक्षक है। पति से प्रेरित होकर सुमन ने भी दिव्यांग बच्चों के लिए कुछ विशेष करने की ठानी। परंतु उनकी शिक्षा इतनी ज्यादा नहीं थी कि वह आगे कुछ कर पाए इसलिए उन्होंने आगे अपनी पढ़ाई को जारी रखा।

दोनों ने मिलकर दिव्यांग बच्चों की पढ़ाने के लिए विशेष बीएड की। स्कूली पढ़ाई के अलावा दंपति ने स्नातक, स्नातकोत्तर की और फिर दिव्यांग बच्चों की पढ़ाई के लिए विशेष बीएड की।

इतना ही नहीं उन्होंने अपने पति के समक्ष दिव्यांग बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा के लिए स्कूल खोलने की इच्छा जताई तो विजय शर्मा कुछ सामाजिक संगठनों से बातें कर उक्त विषय पर विचार विमर्श किया।

जिसके बाद फ्रेंड्स कॉलोनी में कम्यूनिटी सेंटर की जगह बच्चों को पढ़ाने के लिए मिल गई। पिछले दिनों समाजसेवी शिवनारायण शास्त्री ने भू-खंड मुहैया कराया तो अब नेताजी नगर में खुद का ही स्कूल बना लिया। जहां फिलहाल 50 बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। इनमें 10 नेत्रहीन है।

बच्चों की सेवा में ना हो कोई कमी इसलिए स्कूल और घर का काम एक साथ मैनेज किया

शिक्षिका सुमन शर्मा का कहना है कि वह अपने स्कूल में पढ़ने वाले दिव्यांग छात्रों की देखभाल ना सिर्फ एक शिक्षिका बल्कि मां के रूप में करती। उन्होंने यह भी बताया कि अगर किसी आवश्यक कार्य से उन्हें स्कूल के बाहर जाना पड़ता है

तो भी दो छोटे नेत्रहीन बच्चों को साथ ले जाना पड़ता है। सुमन बताती है कि बच्चों की सेवा में कोई कमी न आए, इसके लिए स्कूल और घर के काम को भी मैनेज किया। खुद के भी दो बच्चे है। जिनकी पढ़ाई का भी ध्यान रखती हूं।

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