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प्रदूषण नियंत्रित करने की हरियाणा सरकार ने खोजी तरकीब, पराली बेचने को लेकर कई कंपनियों से किया समझौता

बढ़ता प्रदूषण प्रदेश में गंभीर परेशानी की तरह तेज़ी से फ़ैल रहा है जिसे नियंत्रण में करना बहुत ही अवश्यम्भावी होता जा रहा है। पराली जलाना प्रदूषण बढ़ने के अनेक कारणों में से एक सबसे बड़ा कारण है। लाखों किसान पराली जलाते हैं जिससे वायु की गुणवत्ता बिगड़ती है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए ज़रूरी है पराली को सही रूप से डिस्पोज़ करना। इसी के चलते प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। ऐसी योजना बनायी जा रही है जिसमें प्रदेश सरकार कई कंपनियों से समझौते कर उन्हें पराली बेचेगी।

इस वर्ष यानी 2020 में लगभग 1.75 लाख टन धान की पराली की खरीद बॉयोमास प्लांट्स द्वारा की जा चुकी है। जबकि पूरे सीजन के दौरान 8.58 लाख टन पराली खरीदना प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के मुख्य प्रधान सचिव डी.एस ढेसी अफसरों के साथ पराली प्रबंधन की समीक्षा कर रहे थे और तब ही उन्होंने बताया इस वर्ष कस्टम हाइरिंग सेंटर के माध्यम से 80 प्रतिशत तक की सब्सिडी दर पर मशीनरी उपलब्ध करवाने के लिए 152 करोड़ रुपये की राशि का प्रावधान किया गया है।

इसके अलावा, किसानों को ऐसी मशीनों के लिए व्यक्तिगत स्तर पर 50 प्रतिशत की दर से सब्सिडी उपलब्ध करवाई जाती है। इनके लिए इस वर्ष 216.21 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। इतना ही नहीं, पराली के सही उपयोग के लिए कलानौर, रोहतक में प्लांट लगाया जाएगा। मैसर्ज स्पेक्ट्रम रिन्यूएबल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा कलानौर, रोहतक में 6 टन प्रतिदिन क्षमता के साथ ट स्थापित किया जा रहा है।

जिसमें 15 प्रतिशत धान की पराली का उपयोग होगा और प्रतिवर्ष 4320 टन पराली की खपत होगी। साथ ही, कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद व फतेहाबाद जिलों में धान की पराली से प्रति वर्ष  5.7 लाख टन धान की पराली का उपयोग ईंधन के तौर पर किया जाएगा। ऊर्जा उत्पादन की कंपनियों ने अपने संयंत्र लगाने की सहमति दी है। अब जितना जल्दी प्लांट सेट-अप हो जाए, प्रदेश और प्रदेशवासियों की सेहत के लिए उतना अच्छा है।

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