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आज देखिए किन्‍नरों का अंतिम संस्‍कार, ऐसा करते हैं मृत शरीर के साथ

शादी ब्याह या बच्चे की जन्म जैसी खुशियों के मौके पर घरों में एकाएक किन्नर आ धमकते है और दुआएं देकर बख्शीश लेकर अपनी दुनिया में वापस लौट जाते है। ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी गाड़ियों के शिशे थपकते हुए भी आपने किन्नरों को देखा होगा।

किन्नर यानी कि हिजड़ा जिसे हमारे समाज में थर्ड जेंडर का दर्जा दिया गया है। किन्नरों की जिंदगी साधारण लोगों से काफी अलग होती है। इनके जीवन जीने का तरीके, रहन – सहन सब कुछ अलग होते है।

इनका अपना एक अलग समाज होता है। और ये लोग उसी समाज में रहते है। जैसे हर समाज के अपने अलग- अलग रीति रिवाज होते है, वैसे ही किन्नरों के समाज में भी उनका अपना रिवाज है। जन्म से लेकर मरने तक इनके अलग- अलग नियम है।

कभी आपने किसी किन्नर की शव यात्रा देखी है, नहीं ना, ऐसा क्यों है ये हम आपको बताते है किन्नरों के शव यात्रा में भी छुपे है कई राज। किन्नरों में शव को सभी से छुपा के रखा जाता है।

शव को वैसे सभी धर्मों में छुपा के ले जाया जाता है। लेकिन किन्नरों और आम लोगों के शव यात्रा में अंतर ये है कि उनकी शव दिन की बजाए रात में निकली जाती है।

ऐसा इसीलिए है क्योंकि किन्नरों की शव यात्रा कोई इंसान न देख सके। किन्नर समाज में ये रिवाज कई सालों से चला आ रहा है। इनके समाज में इसी के साथ इस बात का भी खास ध्यान रखा जाता है कि इनकी शव यात्रा में किसी और समुदाय के किन्नर मौजूद न हो।

किन्नरों के अंतिम संस्कार को गैर किन्नरों से छिपा कर किया जाता है। इनकी मान्यता के अनुसार अगर किसी किन्नर के अंतिम संस्कार को आम इंसान देख ले तो मरने वाले का जन्म फिर से किन्नर के रूप में होगा।

किन्नर समाज की सबसे बड़ी विशेषताएं ये है कि किसी भी किन्नर के मौत के बाद मातम नहीं मनाते। इनकी मान्यता है कि मरने के बाद उस किन्नर को इस नर्क रूपी जीवन से छुटकारा मिल जाता है।

इसीलिए मरने के बाद ये लोग खुशी मनाते है। इतना नहीं ये लोग खुद के पैसों से दान देने का काम भी करवाते है। ताकि फिर से उन्हें इस रूप में पैदा न होना पड़ें।

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