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बिटिया के घर शोक के बीच खेले जा रहे हैं सियासी दाव : मैं हूँ फरीदाबाद

नमस्कार! मैं अभागा फरीदाबाद जिसकी एक बेटी इंसाफ के लिए तरस रही है। उसका परिवार गुहार लगा रहा है कि हमारी बेटी के कातिलों को सज़ा दिलवाओ। पर राजनेताओं के लिए इंसाफ का मतलब मुआवज़ा हो गया है।

जो भी नेता बिटिया के घर शोक व्यक्त करने आ रहा है वो बस इसी बात पर ज़ोर दे रहा है कि बेटी के परिवार की आर्थिक रूप से मदद की जाए। अरे जरा सोचिए जिस माँ ने अपनी लाडली को खोया है क्या यह चंद रूपये उसके दुःख को कम कर पाएंगे ? राजनीति की रोटियां सेकनी है तो दाव तो चलने पड़ेंगे और इसी होड़ में हर नेता अब निकिता के घर दस्तक दे रहा है।

निकिता के इंसाफ पर भले ही प्रश्नचिह्न लगा हों, पर सियासत का सिक्का जम चुका है। अब इस पूरे मामले में बस पक्ष और विपक्ष बचा है जो जानता है कि वोट बैंक की राजनीति कैसे की जाती है। निकिता के परिवार का ढाढस बांधना ही था तो ये यह राजनैतिक दल प्रदर्शन में क्यों नहीं पहुंचे ?

इस सवाल का जवाब मेरे पास है, क्यों कि इन्हे डर लग रहा था जनता के सवालों से। पिछले दो दिनों से निकिता के घर के बाहर राजनैतिक जमावड़ा लगा हुआ है। मीडिया कर्मी पहरा डाले बैठे रहते हैं कि जल्द ही उन्हें किसी राजनेता के मुँह से बड़ा बयान सुनने को मिलेगा। पर निकिता के परिवार का क्या जिसका लक्ष्य अपनी बेटी के हत्यारों को सज़ा दिलवाना है।

जैसे ही परिवार के मुँह से इंसाफ शब्द निकलता है कद्दावर नेता मुआवज़े के तार छेड़ देते हैं। प्रदर्शन कर्मी राम नाम के नारों का उद्घोष कर घर के बाहर क्रांति मचाते हैं। अपने फ़ोन के कैमरे से तस्वीरें उतारते हैं, वीडियो बनाते हैं और एक अच्छा शॉट आते ही अपने घर की ओर वापस चले जाते हैं।

क्या ऐसे ही निकिता को इंसाफ मिलेगा ? मैं पूछता हूँ कि जिस बेटी ने मेरे आँगन में जन्म लिया है क्या उसके इंसाफ की मुहीम सोशल मीडिया तक सिमट कर रह जाएगी ? बस सवाल ही सवाल हैं और इन सवालों का कोई जवाब नहीं है। निकिता भी नहीं है और उसके सपने भी नहीं हैं।

अब बस सियासत के सुर छेड़े जा रहे हैं और निकिता हत्याकांड में बरोदा उपचुनाव का परिणाम देखा जा रहा है। यही इस पूरे मामले का और मेरी बिटिया के इंसाफ का काला सच है।

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