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ऑस्ट्रेलिया से स्वदेश लौटा युवा किसानों के लिए बना मिसाल, पराली न जलाने का समाधान ढूंढ कमाए करोड़ों रुपए

हर साल किसानों की मांग पूरी ना होने पर किसानों द्वारा पराली जलाने का मामला उजागर होता था। वहीं इस साल जहां कोरोना वायरस ने दस्तक दी है। वहीं पर्यावरण प्रदूषण का स्तर भी काफी हद तक बढ़ता हुआ नोटिस किया गया,

ऐसे में केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार भी पराली ना जलाने के लिए आग्रह कर चुका है। वहीं किसानों को अभीप्रेरित करने के लिए जगह-जगह कार्यक्रम भी आयोजित किए गए ताकि उन्हें पराली न जलाने के लिए अभी प्रेरित किया जा सके।

वहीं ऑस्ट्रेलिया जा बसा युवा जब स्वदेश अपने भारत लौटा और उसके संज्ञान में पराली जलाने का मामला उजागर हुआ तो उसने इसका समाधान खोजने का मन बनाया और वह आज के समय में सैकड़ों किसानों के लिए एक मिसाल साबित हो रहा है।

हरियाणा के फर्श माजरा गांव निवासी किसान की यह कहानी प्रेरणादायी है। पराली प्रबंधन को कारोबार का रूप दिया और महज एक साल में दो करोड़ रुपये की कमाई कर डाली। इस सीजन में दो महीने में 50 लाख रुपये की आय हो चुकी है।

दो सौ युवाओं को रोजगार भी दे रहे हैं। फसल-अवशेषों के प्रबंधन को कारोबार का रूप दिया और सफलता का नया मंत्र दे डाला।

दरअसल 32 वर्षीय वीरेंद्र यादव को ऑस्ट्रेलिया में ही स्थाई नागरिकता मिल चुकी थी। परंतु यादव का विदेश में मन नहीं लगता था इसलिए वह अपनी पत्नी और बेटीयों को लेकर स्वदेश अपने गांव लौट आए।

यहां आकर उन्होंने अपनी पैतृक खेती शुरू कर दी। जहां उनके सामने फसल अवशेष के निपटान की समस्या सामने आई। वहीं, जब पराली को जलाने से उठने वाले प्रदूषण ने दोनों बेटियों की सेहत को आफत में डाल दिया, तो कुछ करने की ठानी।

वीरेंद्र ने बताया कि प्रदूषण के चलते उनकी दोनों बेटियां एलर्जी का शिकार हो गई थी। उन्होंने कहा कि उसके बाद ही उन्होंने इस विषय को गंभीरता से सोचा इस समस्या का समाधान करने का मन बनाया।

उन्हें कहीं से यह भी पता चला कि पराली जलाने से बेहतर तरीका तो उसे बेचकर भी इसका समाधान किया जा सकता है उसके बाद वह ऐसे कार्य में जुट गए।

वीरेंद्र ने क्षेत्र में स्थित एग्रो एनर्जी प्लांट और पेपर मिल से संपर्क किया तो वहां से पराली का समुचित मूल्य दिए जाने का आश्वासन मिला। तब उन्होंने इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया। न केवल अपने खेतों से बल्कि अन्य किसानों से भी पराली खरीकर बेचने का काम उन्होंने शुरू किया।

इसमें सबसे जरूरी था पराली को दबाकर इसके सघन गट्ठे बनाने वाले उपकरण का इंतजाम, ताकि परिवहन आसान हो जाए। इसके लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग से 50 प्रतिशत अनुदान पर तीन स्ट्रा बेलर खरीदे।

अब सप्ताह भर पहले चौथा बेलर भी खरीद लिया है। एक बेलर की कीमत 15 लाख रुपये है। बेलर पराली के आयताकार गट्ठे बनाने के काम आता है।

वीरेंद्र बताते हैं कि दो माह के धान के सीजन में उन्होंने तीन हजार एकड़ से 70 हजार क्विंटल पराली के गट्ठे बनाए। 135 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से 50 हजार क्विंटल पराली गांव कांगथली के सुखबीर एग्रो एनर्जी प्लांट में बेची।

10 हजार क्विंटल पराली पिहोवा के सैंसन पेपर मिल को भेज चुके हैं और 10 हजार क्विंटल पराली के लिए इसी पेपर मिल से दिसंबर और जनवरी में भेजने का करार हो चुका है।

इस तरह इस सीजन में अब तक उन्होंने 94 लाख 50 हजार रुपये का कारोबार किया है। इसमें से खर्च निकालकर उनका शुद्ध मुनाफा 50 लाख रुपये बनता है। जनवरी तक और भी कमाई होगी।

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