पीएलपीए एक्ट के तहत वन विभाग को मिले सुप्रीम कोर्ट के मकान खाली करने के आदेश के बाद सोहना की आधा दर्जन कॉलोनियों में इस कदर हड़कंप मच गया कि तोडफ़ोड़ की कार्यवाही को रोकने के लिए जल्द ही लोग लामबंद होने शुरू हो। वहीं एक जनहित याचिका सर्वोच्च न्यालय में दायर की जाएगी। जिसे लेकर स्थानीय लोगों ने तमाम तैयारियां शुरू कर दी हैं।
लोगों ने वन विभाग के सर्वे पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि शहर के ऐतिहासिक शिव कुंड तक को वन विभाग ने अपने निशानदेही में लेकर इस मामले को और भी गंभीर कर दिया है। गौरतलब है कि वन विभाग ने आधा दर्जन कॉलोनियों के सैकड़ों मकानों पर डाक विभाग के जरिए सेक्शन चार व पांच के तहत नोटिस भेज कर एक सप्ताह के अंदर मकान खाली करने के लिए बोला गया हैं। जब से लोगों को नोटिस मिले हैं तभी से सोहना में पूरी तरह से हड़कंप मचा हुआ है। लोगों को अब यह डर सता रहा है कि आखिर अचानक अब कहां जाएं।

सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने के लिए तैयारी कर रहे समाजसेवी महेश खटाना ने जानकारी देते हुए बताया कि वन विभाग की लापरवाही व पुरानी सरकारों की अनदेखी का खामियाजा हजारों गरीब लोगों को भुगतना पड़ रहा है जिसके कारण उनके आशियाने पर तलवार लटकी हुई है। वन विभाग ने पीएलपीए एक्ट के अनुसार हजारों परिवारों को बेघर करने के लिए नोटिस भेज दिए हैं। वन विभाग को साल 1970 में खाली पड़ी जमीन को पेड़ लगाने के लिए 25 साल के लिए दिया गया था।
वन विभाग को दी गई जमीन का कार्यकाल साल 1995 में खत्म हो गया था। दोबारा से यह जमीन साल 2004 में वन विभाग को दे दी गई यानी कि नौ साल की अवधि तक इस जमीन को रीन्यू नहीं किया गया। इस दौरान सरकार ने लोगों को मकान बनाने व जमीन खरीदने के लिए एनओसी भी दी, जिसके बाद लोगों ने मकान बनाए, लेकिन सरकार ने नौ साल के बीच जो एनओसी दी थी और जो लोगों ने मकान बनाए उस टाइम पीरियड के लिए मानीय सर्वोच्च न्यालय को कुछ भी नहीं बताया गया।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा है, वह पुराने से पुराने अपने मकानों के दस्तावेज लेकर आएं ताकि माननीय अदालत को इस विषय को लेकर विस्तार से बताया जा सके। देखना इस बात का होगा कि क्या इस जनहित याचिका को दायर करने से लोगों को निजात मिलती है या फिर हजारों परिवार बेघर ही होंगे।
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