Pehchan Faridabad
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मेरी सतह पर कीचड़ है और दीवारें कालिख से लिपटी हुई हैं : मैं हूँ फरीदाबाद

नमस्कार! मैं हूँ फरीदाबाद। अरे वही फरीदाबाद जिसके माथे पर स्मार्ट सिटी नाम का सरकारी ठप्पा लगा हुआ है। मैं दर्द में हूँ और आज अपने गम को बाटने के लिए आप सबको एक कहानी सुनाता हूँ। कहानी सच्ची है क्यों कि मैं अपने निज़ाम की तरह झूट नहीं बोलता।

परसों रविवार की सुबह जब तुम सब अपने अपने घरों में अलसिया रहे थे तब मैं जल रहा था। निगम कार्यालय की वो दीवारें भी चिल्ला रही थी कि कोई तो बचालो, अरे कोई तो सुनलो हमारी गुहार। पर किसी के कान में जूँ नहीं रेंगी। आज़ादी का जश्न मनाने के बाद जब मै रविवार को आराम से सो रहा था तब मैने एक आहट सुनी। कोई पहरा डाले देख रहा था, इंतज़ार कर रहा था मेरे नींद में जाने का। मेरी आँख लगते ही उस दंगाई ने अपने नापाक इरादों को अंजाम दिया। धीरे धीरे उसने मेरी ओर कदम बढ़ाए, मेरी दीवारों से टकराते उसके हाथ एक जघन्य अपराध को अंजाम देने के लिए तैयार थे। मैं उस अपराधी को नहीं जानता पर ये जानता हूँ की उसका मकसद क्या था।

याद है मुझको वो सारे घोटाले, वो चोरियाँ, वो तमाम झूठ जो सफ़ेद पोश अफसरों और ठेकेदारों ने अपनी तिजोरियों को भरने के लिए बोले थे। सबको डर था पोल खुलने का। चिंतित थे सब यह सोचकर कि अब जल्द ही सच से पर्दा उठ जाएगा। पर रविवार की सुबह उस अपराधी की जीत हुई जिसने मेरे और मेरे अपनों के साथ बेईमानी की।

कल जब मैं आग में झुलस रहा था तब ये भी सोचा मैंने कि काश, काश मेरी टूटी सड़कों पर जमा हुआ बारिश का पानी मेरी इन जलती दीवारों को आराम दे पाता। पर ज्यादा अफ़सोस तो इस बात का है कि मेरी किस्मत में ” विकास ” का साथ नहीं। तभी तो कल मेरी दीवारों के बीच विकास कार्यों का निर्वाह करने वाले तमाम दस्तावेज़ जलकर राख हो गए।

मेरे पास अब विकास के नाम पर मेरी सतह पर लगा कीचड़ और कालिख से लिपटी दीवारें है। मैं तुम सबका बोझ ढोह रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ कि मेरे साथ वही स्मार्ट सिटी वाला बर्ताव हो। पर परसों उस आग में झुलसने के साथ साथ मेरी उमीदें भी उस फरेब की ज्वाला में भस्मीभूत हो गई।

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