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बड़ा अध्यन : रंग देखकर अपना शिकार बना रहा है कोरोना वायरस, पढ़ें कौनसे रंग को अधिक खतरा

कोरोना वायरस जिस प्रकार अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है, उस से निजात पाना इतना असान नहीं लग रहा है। हर दिन दुनिया में लाखों कोरोना संक्रमण मिल रहे हैं। ऐसा अध्यन आया है सामने कि कोरोना संक्रमण बच्चों का ‘रंग’ देखकर निशाना बना रहा है। सिलसिलेवार हुए अध्ययनों से पता चला है कि इस महामारी ने अश्वेत व हिस्पैनिक बच्चों को ज्यादा प्रभावित किया है। 

कोरोना महामारी के ऊपर अनेकों अध्यन हो गए हैं। लेकिन अध्यन में श्वेतों की तुलना में अश्वेत बच्चों की अस्पताल में भर्ती होने की दर पांच से आठ गुना ज्यादा रही तो उनकी मौत भी कहीं अधिक हुई है।

बड़ा अध्यन : रंग देखकर अपना शिकार बना रहा है कोरोना वायरस, पढ़ें कौनसे रंग को अधिक खतरा

भारत हो या अमेरिका सभी जगह इसकी जड़ें बहुत मजबूत हो गई हैं। इस अध्यन में पता लगा है कि जिन बच्चों में जानलेवा मल्टी सिस्टम इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम पाया गया, उनमें भी अश्वेत बहुतायत में मिले। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशऩ के अनुसार, अमेरिका में अब तक करीब 100 बच्चों ने कोरोना से जान गंवाई है, जिनमें ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के ही हैं।

यह अध्यन अभी अमेरिका में और कुछ और देशों में हुआ है। भारत में अभी इसकी कोई जानकारी नहीं मिली है। जर्नल बीएमजे में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में ही नहीं, ब्रिटेन में भी अश्वेत बच्चों को कोरोना अधिक प्रभावित कर रहा है। ब्रिटेन के अस्पतालों में आईसीयू में जाने वाले संक्रमित बच्चों में अश्वेतों की तादाद तुलनात्मक रूप से ज्यादा रही है।साथ ही एमआईएस -सी ने उन्हें ज्यादा शिकार बनाया है। 

कोरोना वायरस से हम सभी जीत सकते हैं, यदि थोड़ी सतर्कता दिखाएँ। अमेरिका में चिल्ड्रंस नेशनल हॉस्पिटल की डॉ का कहना है, मार्च -अप्रैल के दौरान वाशिंगटन के एक क्षेत्र में जो एक हजार बच्चे संक्रमित मिले थे, उनमें  से आधे हिस्पैनिक और एक तिहाई अश्वेत थे। डॉक्टर के अध्ययन के मुताबिक, वाशिंगटन में श्वेतों की तुलना हिस्पैनिक बच्चों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने की संभावना छह गुना रही। वहीं अश्वेतों में यह दोगुनी दिखाई दी।

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