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प्रेम पत्र से लेकर व्हाट्सएप्प चैट तक बदल चुका है हिंदी का अस्तित्व

“हिंदी हैं हम” यह शब्द नहीं जज्बात हैं, ऐसा कहना है इस देश के अधिकतम युवाओं का। चलिए अब बात करते हैं उस सच की जिसे कुबूलने में हम सब कतराते हैं। हम अब अपनी मात्र भाषा से तंग आ चुके हैं। हिंदी से खीजने की कहानी शुरू होती है निजी स्कूलों के प्रांगण से।

जब क्लास टीचर बच्चों से हिंदी का प्रयोग करने पर जुर्माना लगाया करते हैं। विद्यालय में अंग्रेजी का प्रयोग करना अनिवार्य होता है। जो बच्चे स्कूल में हिंदी में वार्तालाप करते हैं उन्हें दंड दिया जाता है। पर बात की जाए भाषा की तो आजादी के दौर से लेकर अभी तक हिंदी में बहुत सारे परिवर्तन आए हैं।

प्रेम पत्र से लेकर व्हाट्सएप्प चैट तक बदल चुका है हिंदी का अस्तित्व
प्रेम पत्र से लेकर व्हाट्सएप्प चैट तक बदल चुका है हिंदी का अस्तित्व

एक समय था जब लोग अपनों का हालचाल लेने के लिए पत्र लिखा करते थे। इंतजार किया करते थे कि कब उन्हें उस खत का जवाब मिल पाएगा। अपने बाबा से एक कहानी सुनी थी मैंने। कहानी थी उनके हॉस्टल वाले दिनों की। जब वह अपने अम्मा और बापू को हफ्ते में एक तार जरूर डाला करते थे। उस पत्र में वह अपना हाल हिंदी में व्यक्त किया करते थे।

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बाबा ने बताया कि जब वह मेरी दादी से मिलने गए थे तब उन्होंने रिश्ते के लिए हामी तार भेजकर दी थी। वह समय था जब प्रेमी प्रेमिका अपने प्यार का इजहार हिंदी के साफ शब्दों में किया करते थे। गीत लिखकर भी अपने जज्बातों को एक दुसरे तक पहुंचाया जाता था। बात की जाए उस भाषा की तो आज वह हिंदी कही न कही धूमिल पड़ी हुई नज़र आती है।

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प्रेम पत्र से लेकर व्हाट्सएप्प चैट तक बदल चुका है हिंदी का अस्तित्व

आज के दौर में व्हाट्सएप्प और दुसरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म उस पत्र वाले दौर को एकदम विलुप्त कर दिया है। आज जब एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका तक कोई पैगाम पहुँचाना होता है तो उसे प्रेम पत्र नहीं बल्कि मैसेज बोला जाता है।

प्रेम पत्र से लेकर व्हाट्सएप्प चैट तक बदल चुका है हिंदी का अस्तित्व
प्रेम पत्र से लेकर व्हाट्सएप्प चैट तक बदल चुका है हिंदी का अस्तित्व

व्हाट्सएप्प पर पिंग किया जाता है और रिश्ता बनाने के स्थान पर सेटिंग की जाती है। जिस तरीके से हिंदी भाषा का स्वरुप बदला गया है यह इस देश का दुर्भाग्य है। याद कीजिए आजादी का वो दौर जब हिंदी का प्रयोग कर के अपने देश को मुक्त कराने के विचारों को सामने रखा गया था। क्या वह हिंदी अपना अस्तित्व खो चुकी है ?

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