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प्रवासी भारतीय दिवस : दूसरे देशों की नागरिकता के बावजूद भारत के लिए धड़कता है दिल

अपना देश अपना होता है। अपनी मिट्टी में जो खुशबू होती है वो विदेश में कहीं नहीं मिलती। साल 2000 में एक फिल्म आई थी फिर भी दिल है हिदुस्तानी। इसमें गाने के बोल थे – हमलोगों को समझ सको तो समझो दिलबर जानी जितना भी तुम समझोगे उतनी होगी हैरानी, फिर भी दिल है हिदुस्तानी, फिर भी दिल है हिदुस्तानी।

पूरे विश्व में भारतियों के कामों की तारीफ होती है। देश के हर कोने से बाहर जाके बसे लोग आज भी भारत को बहुत प्यार करते हैं। हरियाणा के राज अग्रवाल को जानिए। ये पिछले 35 वर्षो से अमेरिका में रह रहे हैं। वहीं की नागरिकता भी ले रखी है, लेकिन दिल भारतीयों खासकर दिव्यांगों के लिए हमेशा धड़कता रहता है।

देश के जिसका दिल ना धड़के वो देशप्रेमी थोड़ी ना हो सकता है। देश ही जो हमें पहचान देता है। हमारे नाम के बाद लिखा आता है इंडियन। यही तो हमारी पहचान है “इंडियन” “भारतीय” “हिदुस्तानी” रोजगार की तलाश में ताजनगरी से बड़ी संख्या में लोग विदेशों में गए और वहां बस गए। वहां अच्छे पदों पर काबिज हैं और अपने-अपने क्षेत्र में नाम कमा रहे हैं।

आज प्रवासी भारतीय दिवस भी है। बात यदि करें, राज गग्रेवाल की तो उन्होनें दिवायंगो की सहायता के लिए अंबाला छावनी में दिव्यांग केंद्र खोल रखा है। यहां उत्तराखंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों से दिव्यांग आते हैं और उन्हें निश्शुल्क कृत्रिम अंग दिए जाते हैं।

देश और दुनिया में भारतियों की अपनी अलग पहचान है। 2003 में इस दिन को याद करते हुए पहली बार प्रवासी भारतीय दिवस मनाया गया। मकसद था, देश के विकास में प्रवासी भारतीयों यानी NRIs के योगदान को पहचान देना। विदेश मंत्रालय के मुताबिक 210 देशों में 1.34 करोड़ NRI हैं।

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