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विकास की भेंट चढ़ गए हरियाणा के जंगल, अब अरावली की है बारी

एक तरफ हरियाणा सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बना रही है वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में अरावली की वादियों में खनन को वैध करने की मांग कर रही है।

हरियाणा सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अरावली की वादियों में खनन को वैध करने को लेकर एक याचिका दायर की है। याचिका पर फैसला 19 अप्रैल को आएगा। ‌ यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सरकार के हक में आता है तो अरावली की स्थिति बद से बदतर हो जाएगी।

दरअसल, दिल्ली एनसीआर में औद्योगिकीकरण इतना बढ़ गया है कि स्वच्छ हवा व जंगलों के लिए स्थान ही नहीं रहा है। पूरे हरियाणा का केवल 3.6 प्रतिशत हिस्सा ही जंगलों से घिरा हुआ है जोकि पूरे भारत में सबसे कम है। स्मार्ट सिटी फरीदाबाद में भी विकास के नाम पर आए दिन पेड़ों को काट दिया जाता है इसका जीता- जागता उदाहरण सेक्टर 17 स्थित रोज गार्डन है। सेक्टर 17 के रोज गार्डन को मुंबई एक्सप्रेसवे के लिए हटाया जा रहा हैं।


अगर बात करें अरावली पर्वत श्रृंखला की तो श्रृंखला 5 जिलों गुड़गांव, मेवात,फरीदाबाद, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ से होकर गुजरती है। फरीदाबाद और गुड़गांव की बात करें तो इसका दायरा असोला से शुरू होकर फरीदाबाद के सूरजकुंड, मांगर बणी, पाली बणी, बडखल व गुड़गांव के दमदमा तक है। दोनों जिलों में इसका कुल दायरा लगभग 180 स्कवॉयर किलोमीटर करीब है। अरावली की पहाड़ियों में जंगल अधिक हैं। इसके अलावा पेड़ों की अलग-अलग किस्म भी हैं।

अरावली की पुरानी चट्टानों में काफी खनिज हैं। अक्सर देखने में आता है कि अरावली में लकड़ी माफिया कीकर के पेड़ काट कर ले जाते हैं। इसके अलावा अवैध खनन भी काफी होता है। फरीदाबाद की सरहद में आने वाले मांगर गांव को घने फॉरेस्ट के लिए जाना जाता है।


ऐसे में यह सोचने का विषय है कि अगर इस तरीके से ही जंगल और प्रकृति विकास की भेंट चढ़ जाएगी तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसा होगा।

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