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भला हो सरकार का जो ले रही है ग्रामीण क्षेत्रो का संज्ञान, मुसीबत में डाल रहे है आंदोलनरत किसान

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फरीदाबाद : महामारी के दूसरी लहर ने विकराल रूप धारण कर लिया है पिछली बार जब महामारी ने दस्तक दी थी तो आलम यह था कि ज्यादातर मरीज शहरी क्षेत्र से आ रहे थे तो लोगों ने इसका आसान सा तरीका यह निकाला था की जिनके घर ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है और वह नौकरी पैसा के कारण शहरों में रह रहे हैं ।

तो उन्होंने गांव जाकर ज्यादा मुनासिब समझा वहां के खानपान और आबोहवा में खुद को सुरक्षित महसूस किया लेकिन इस बार महामारी ने उल्टे पैर पसारे हैं इस समय शहरों से ज्यादा मरीज गांव की ओर से है।

भला हो सरकार का जो ले रही है ग्रामीण क्षेत्रो का संज्ञान, मुसीबत में डाल रहे है आंदोलनरत किसान

अब तक इस सोच के साथ जी रहे थे कि महामारी का असर शहरों में ज्यादा है और गांव इससे बचे हुए हैं क्योंकि गांव में शुद्ध हवा पानी है और प्रदूषण के लिए भी बचा हुआ है पर इस बार महामारी ने गांव को भी अपनी चपेट में ले लिया है सबसे ज्यादा असर गांव में रह रहे परिवारों पर हुआ है ।

गांव में परिवार के कई सदस्य इसकी गिरफ्त में है ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण वहां पर इलाज भी समुचित तौर पर नहीं मिल पा रहा है हालांकि सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि सभी ग्रामीणों को इलाज दिया जाए लेकिन ग्रामीण लेना नहीं चाहते कुछ ग्रामीणों का ऐसा मानना है।

भला हो सरकार का जो ले रही है ग्रामीण क्षेत्रो का संज्ञान, मुसीबत में डाल रहे है आंदोलनरत किसान

कि यदि हमने टेस्टिंग कराई तो रिपोर्ट में पॉजिटिव ना आ जाए लेकिन सरकार गांव में फैल रहे महामारी को भी उतनी ही गंभीरता से ले रही है जितनी शहरों में आए मरीजों को ले रही है इसको संज्ञान में लेते हुए करीब 8000 टीमों का गठन कर दिया गया है।

प्रत्येक को 500 500 परिवारों की जिम्मेदारी सौंपी गई है ग्रस्त लोगों के हर तरीके के टेस्ट कराए जाएंगे दवाइयां भी दी जाएंगी और उन्हें इलाज के दौरान निगरानी में रखा जाएगा लेकिन इन सब बातों में एक सवाल यह जरूर सामने आता है कि आखिर गांव में इसकी वजह क्या है कुछ लोग इसे सरकार की लापरवाही बता रहे हैं ग्रामीण इसे वायरल फीवर और किसी अन्य बीमारी का नाम दे रहे हैं

भला हो सरकार का जो ले रही है ग्रामीण क्षेत्रो का संज्ञान, मुसीबत में डाल रहे है आंदोलनरत किसान

लेकिन कोई भी इस महामारी की सच्चाई को स्वीकार ने के लिए तैयार नहीं है सरकार द्वारा किए गए एक सर्वे में सामने आया कि टीकरी और सिंघु बॉर्डर पर धरनारत किसान लगातार दिल्ली के साथ-साथ अन्य इलाकों के जुड़े रहे हैं इन किसानों में पंजाब के साथ-साथ हरियाणा के भी बहुत से राज्यों से किसान मौजूद हैं जैसे कि फरीदाबाद गुड़गांव रेवाड़ी जींद भिवानी करनाल हिसार इत्यादि जिले शामिल है।

सोचने वाली बात यह है कि इन सभी इलाकों में कोरोना के सबसे ज्यादा केस मिल रहे हैं इन गांव में कोरोना होने का एक कारण आंदोलन भी बताया जा सकता है प्रदेश सरकार लगातार आंदोलनकारियों से आग्रह करती आ रही है कि वह सबसे पहले अपनी सेहत पर ध्यान दें आंदोलन तो फिर भी किया जा सकता है।

भला हो सरकार का जो ले रही है ग्रामीण क्षेत्रो का संज्ञान, मुसीबत में डाल रहे है आंदोलनरत किसान

लेकिन सरकार की हर बात को नजरअंदाज करते हुए ग्रामीण ना तो टेस्ट करा रहे हैं और ना ही खुद का ध्यान रहे रख रहे हैं बल्कि खुद को एक नई मुसीबत के मुंह में डाल रहे हैं

उनको लगता है कि कोरोना बीमारी किसान आंदोलन में नहीं आ सकती हैं। यदि समय रहते इन ग्रामीणों ने इलाज नहीं कराया तो ग्रामीणों की जिद पूरे क्षेत्र को मौत के मुंह पर लाकर खड़ा कर देगी इसके लिए जिम्मेदार मात्र किसान संगठन के नेता हो सकते हैं ।

भला हो सरकार का जो ले रही है ग्रामीण क्षेत्रो का संज्ञान, मुसीबत में डाल रहे है आंदोलनरत किसान

लेकिन जिम्मेदारी की बात की जाए तो सभी लोगों की जिम्मेदारी बराबर मानी जा सकती है पंजाब से जितने भी आंदोलनकारी टिकरी व सिंधु बॉर्डर पर पहुंचते हैं वह हरियाणा के रास्ते होकर रह जाते हैं उनकी हरियाणा में रिश्तेदारी भी है

भला हो सरकार का जो ले रही है ग्रामीण क्षेत्रो का संज्ञान, मुसीबत में डाल रहे है आंदोलनरत किसान

सरकार को इस संबंध में मिली एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक जीटी रोड बैंड के साथ हिसार झज्जर और रोहतक जिलों में उन्हें क्षेत्रों में सबसे ज्यादा संक्रमण पाया गया है फिलहाल इन सभी किसान नेता संगठनों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि सर्वप्रथम किसानों की सेहत है उसके बाद अन्य कार्य हैं

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