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किसान नेताओं से सिर्फ वार्ता के लिए बातचीत के मूड में नहीं है केंद्र, जानिये क्‍या चाहती है सरकार

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महामारी और किसान आंदोलन दोनों ने ही देश की नाक में दम किया हुआ है। एक अदृश्य दुश्मन है देश का तो शायद दूसरा पता नहीं कौन? महामारी के भय और लगातार कमजोर पड़ते आंदोलन के कारण कृषि कानून विरोधी किसान संगठन वापसी का रास्ता तो ढूंढने लगे हैं, लेकिन जिद नहीं छोड़ी है। सरकार को वार्ता का प्रस्ताव भेजने के साथ कानून को रद करने की मांगों को भी दोहराया है। वहीं केंद्र सरकार सिर्फ वार्ता के लिए बातचीत के मूड में नहीं है।

किसान नेताओं को और उनके आकाओं को शायद आभास होने लगा है कि केंद्र पर उनके आंदोलन से कुछ प्रभाव नहीं पड़ रहा। सरकार का मानना है कि संगठन के नेता खुले दिमाग से आएं और कानून की अड़चनों को दूर करने के लिए उचित विचार करें तो सरकार कभी भी बातचीत कर सकती है।

किसान नेताओं से सिर्फ वार्ता के लिए बातचीत के मूड में नहीं है केंद्र, जानिये क्‍या चाहती है सरकार

तीनों कृषि कानून किसानों की भलाई के लिए हैं। लेकिन यह आंदोलन नया केजरीवाल खोजने के चक्कर में अभी भी चल रहा है। दिल्ली की सीमा पर हरियाणा में धरने पर बैठे पंजाब के कृषि कानून विरोधी किसान संगठनों की जिद की वजह से आंदोलन छह महीने खिंच चुका है। धरना स्थलों पर महामारी संक्रमण से बचाव का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होने दिया जा रहा है।

किसान नेताओं से सिर्फ वार्ता के लिए बातचीत के मूड में नहीं है केंद्र, जानिये क्‍या चाहती है सरकार

किसान नेता किसानों को टीका लगवाने से भी मना कर चुके हैं। किसान नेता चढूनी ने तो वैक्सीन को लेकर यह तक कह दिया था कि इसको लेकर मर्द से औरत बन जाएंगे। दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों को महामारी से बचाव के उपाय करने की हिदायत नहीं दी जा रही है। इसी कारण धरना स्थल से लगातार आवाजाही और पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह धरना प्रदर्शन की वजह से राज्य में संक्रमण की दर राष्ट्रीय औसत से भी अधिक हो चुकी है।

किसान नेताओं से सिर्फ वार्ता के लिए बातचीत के मूड में नहीं है केंद्र, जानिये क्‍या चाहती है सरकार

किसान नेता लगातार अब प्रयास कर रहे हैं केंद्र से बातचीत का लेकिन वो तभी संभव है जब यह लोग अपनी जिद्द को छोड़ेंगे। किसान नेता अपने आकाओं के कहने पर किसानों को आगे कर देते हैं खुद कभी सामने नहीं आते किसी नेता की गाड़ी रोकने को।

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