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लाखों की नौकरी छोड़कर डेयरी फार्मिंग शुरू की, चार साल में ही टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए पहुंचा

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प्रधानमंत्री मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर जोर दिया है। इसके पीछे मंशा है कि लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरे। वर्तमान समय में अनेकों लोग नौकरी को छोड़ बिज़नस के क्षेत्र में अपनी किस्मत को आजमा रहे हैं। आज अनेकों युवा बिज़नस के क्षेत्र में खुद के भविष्य को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। दुर्लभ रावत भी इन्हीं लोगों में से एक हैं, जिन्होंने इंजीनियरिंग की अच्छी-ख़ासी नौकरी को छोड़कर अपना बिज़नस शुरू किया और उसमें सफलता भी पाई।

ये कहानी है उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर के रहने वाले दुर्लभ रावत की। आज दुर्लभ अनेकों लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन चुके हैं। आज हर कोई दुर्लभ की कहानी से प्रेरित भी हो रहा है।

लाखों की नौकरी छोड़कर डेयरी फार्मिंग शुरू की, चार साल में ही टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए पहुंचा

हार मत मानो,आपकी जीत हमेशा आपके आस पास ही होती है। इस बात को दुर्लभ ने चरितार्थ किया है। दुर्लभ रावत उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के रहने वाले हैं। दुर्लभ इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद अपने क्षेत्र में नौकरी करने लगे। लेकिन 12 साल तक नौकरी करने के बाद दुर्लभ नौकरी से उब चुके थे। क्योंकि नौकरी में वह निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नही थे इसी कारण से उन्होंने नौकरी छोड़ दी और 50 पशुओं के साथ अपनी डेयरी की शुरुआत की।

लाखों की नौकरी छोड़कर डेयरी फार्मिंग शुरू की, चार साल में ही टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए पहुंचा

यह उनके लिए आसान नहीं था लेकिन उनके हौंसलें बहुत ही बुलंद थे। वजह यह थी कि वह ऐसा काम करना चाहते थे, जिसमें खुद फैसले ले सकें। 2016 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और डेयरी फार्म शुरू किया। अभी वह दूध, दही, घी से लेकर हर उस प्रोडक्ट की मार्केटिंग करते हैं, जिनकी जरूरत एक किचन में होती है। उनके 7 हजार से ज्यादा कस्टमर्स हैं। पिछले साल उनका टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए रहा।

लाखों की नौकरी छोड़कर डेयरी फार्मिंग शुरू की, चार साल में ही टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए पहुंचा

जब हम सही रास्ते पर चल रहे हैं और हमें अपनी मंज़िल करीब नजर आती है। जब दुर्लभ ने अपना डेयरी फार्म खोला तो उन्हें उससे मुनाफा नहीं हो पा रहा था। तब उनके एक दोस्त ने दुर्लभ को एक ब्रांड बनाने की सलाह दी और दुर्लभ ने भी वैसा ही किया। जिसके बाद धीरे-धीरे दुर्लभ के ग्राहक बनने लगे। दुर्लभ स्कूल के बाहर खड़े होकर बच्चों के माता-पिता को अपने उत्पाद की जानकारी देते थे। जिसके बाद उनका उत्पाद बाज़ार में अपनी जगह बनाने लगा।

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