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आज मेरे शिव का जन्मदिन है तो मेरा ये लेख पढ़ जाइये

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ये वह वक़्त था जब गांव में शाम को दादा-दादी नियम से रामचरितमानस का एक घण्टे बच्चों को पाठ करवाते थे। यह परंपरा इतनी अच्छी थी कि हम बच्चों को रामचरितमानस की सैकड़ों चौपाइयां मुहज़ुबानी याद थीं और हम अंताक्षरी फिल्मी गानों से नहीं रामचरितमानस की चौपाइयों से खेला करते थे। मगर यह हमारा पतन ही है कि हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं।

चूँकि मैं संगीत प्रेमी बचपन से ही रहा हूँ और क्लासिकल सुनने का एक अजीब सा नशा मुझे आज तक है। 2008 में कहीं से मुझे अचानक ही एक ग़ज़ल ग़ुलाम अली साहब की आवाज़ में सुनने को मिली। ग़ज़ल थी “की पुछदे ओ हाल फ़क़ीरां दा।

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इस ग़ज़ल का एक शेर मेरे दिमाग में ऐसे बैठा कि मैं बेचैन हो गया। शेर था –

मैं दर्द नूं काबा कह बैठा
रब नां रख बैठा पीड़ां दा

मतलब आप दर्द की इंतहा और सनातन का मूल इस शेर में खोज लेंगे तो हैरान रह जाएंगे कि कोई दर्द को इस तरह कैसे परिभाषित कर सकता है। सनातन सिद्धांत “हर स्थिति में सम रहना” कितने सटीक तरीके से इस शेर में प्रतिपादित किया है बटालवी ने। दर्द को काबा कहना और पीड़ाओं को रब समझ लेना आसान नहीं है।

इक कुड़ी जिद्हा नां मुहब्बत
गुम है-गुम है-गुम है
साद-मुरादी सोहनी फब्बत
गुम है-गुम है-गुम है

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बटालवी को जब आप क़रीब से जानते हैं तो यह भी महसूस कर सकते हैं कि इस शेर में कितनी सच्चाई है। बटालवी एक अजीब दर्द में ताउम्र क़ैद रहे लेकिन दर्द को दर्द की तरह फिर भी नहीं लिया। दुख-दर्द में भी आनंद की मनोदशा होना आपको वैराग्य दे जाता है और बटालवी को समझने पर वह वैरागी ही जान पड़ते हैं।

ख़ैर मुद्दे पर लौटते हैं। उस ग़ज़ल के बारे में जानकारी करने पर मालूम हुआ कि यह किसी शिवकुमार बटालवी की लिखी हुई है। चूंकि मैं हिंदीभाषी क्षेत्र से आता हूँ तो मुझे पंजाबी समझ नहीं आती थी। नुसरत साहब को बचपन से सुनते रहने से एक फ़ायदा यह हुआ कि मुझे टूटी फूटी पंजाबी समझ आती थी। मैंने फिर बटालवी को पढ़ने और समझने के लिए पंजाबी समझना शुरू किया। फिर मुझे बटालवी से इश्क़ हो गया जब मैंने उनकी वो रचना पढ़ी-

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माये नी माये
मैं इक शिकरा यार बनाया
ओदे सिर ते कलगी
ओदे पैरीं झांजर
ते ओ चोग चुगेंदा आया

इसके बाद मैंने बटालवी का साहित्य खंगालकर लगभग लगभग पूरा पढा। शिवकुमार बटालवी पंजाबी कविता के ध्रुवतारा हैं। बहुत कम उम्र में जितनी लोकप्रियता बटालवी को मिली, वह कम ही कवियों को मिल पाती है। अमृता प्रीतम ने बटालवी के बारे में लिखते हुए कहा है कि उनकी कला में पंजाब की धरती के पेड़-पौधे, वहां की रस्में-रवायतें, परंपराएं, संस्कार मुखरित हो उठते हैं, लेकिन दर्द जैसे सारी दुनिया का उसमें समा गया है।

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यही दर्द शिव कुमार बटालवी की कविता की पहचान है। वह पंजाब की मिट्टी, वहां की लोक-परंपरा से जुड़े कवि हैं। उनकी कविताओं और गीतों में पंजाब की आबोहवा इस कदर घुलमिल गई है कि उससे अलग कर के कवि को देखा नहीं जा सकता। जिसे पंजाबियत कहा जाता है, वह बटालवी के गीतों की पहचान है।

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बटालवी क्या थे और उनका मर्तबा क्या था यह ऐसे समझिए कि जब बटालवी का विवाह हुआ तो विवाह में जितने भी लोकगीत गाये जा रहे थे वह सब बटालवी के ही लिखे हुए थे। उस दौर में पंजाब में बटालवी के लोकगीत ही गाये जाते थे। बटालवी सरापा मुहब्बत और प्यारे इंसान थे और प्यारे लोग इस दुनिया को किसी भी दौर में रास नहीं आये हैं।

अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा

अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा

फूल सा है खिला आज दिन…

रब्बा मेरे दिन ये ना ढले

वो जो मुझे ख़्वाब में मिले

उसे तू लगा दे अब गले

तैनूं दिल दा वास्ता

लोगों ने उनकी तमाम रिकॉर्डिंग्स उनसे जलन के कारण डिलीट करवा दीं। उनकी कुछ ही रिकॉर्डिंग्स अब उपलब्ध हैं। बटालवी की एक खासियत यह भी थी कि जितना अच्छा वो लिखते थे उनका ही सुरीला वो गाते भी थे।

बटालवी की बीबीसी की एक रिकार्डिंग है जिसमें वह अपनी रचना गाकर सुना रहे हैं। आप उसे सुनिए और उनकी सादगी को महसूस कीजिये।

बटालवी ने कविता में रोमांसवाद को जिस मुकाम पर पहुंचाया, वह दुर्लभ है। बटालवी अपनी ही तरह के मौलिक कवि थे।बटालवी ने दर्द को पूरी तरह जिया था। उन्हें दर्द से ही मानो मोहब्बत हो गई थी।

उनके गीतों में जनजीवन से जुड़ी चीजें भी आई हैं किन्तु उनका मूल स्वर प्रेम और विरह ही है। उस समय जब अन्य कवि यथार्थवादी कविताओं की रचना कर रहे थे तब बटालवी ने रोमांसवाद को चरम पर पहुंचा दिया। यही कारण है कि इनकी तुलना अंग्रेजी के कवि जॉन कीट्स से की जाती है।

बटालवी के बारे में उनकी सभी कविताओं का संकलन करने वाले मनमोहन सिंह ने लिखा है, ‘जब भी परमात्मा किसी पैगंबर को संसार में भेजता है तो वह या तो फकीर का रूप लेता है या कवि का। बटालवी ऐसे ही कवि थे। उनका स्थान और कोई दूसरा नहीं ले सकता।

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बटालवी मुझे संत लगते हैं। मैं कभी इस दुनिया और दुनियादारी से सामंजस्य नहीं बिठा पाया और ऐसा ही मुझे बटालवी के संदर्भ में लगता है। शायद यही कारण है कि मुझे बटालवी बेइंतेहा पसंद हैं।

बटालवी इस दुनिया के सांचे में कभी फिट ही नहीं हुए क्योंकि बटालवी और यह दुनिया किसी समानांतर रेखा के दो अलग अलग छोर थे। माँ शारदे का यह पुत्र 36 वर्ष की अल्पायु में ही इस दुनिया को अपने हाल पर छोड़कर वापस जन्नत चला गया और अपने पीछे अपने अफ़साने छोड़ गया।

लेखक : सोनू शर्मा (सूफ़ी)

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