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एक प्रवचन करने के इतने रुपये चार्ज लेती हैं जया किशोरी, फिर पैसों से करती हैं ऐसा काम

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केवल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी जया किशोरी एक बड़ा नाम बन चुकी हैं। सोशल मीडिया पर भी जाया किशोरी की फैन फोल्लोविंग लगातार बढ़ती जा रही है। नानी बाई का मायरा और श्रीमद् भागवत की कथा का वे वाचन करती हैं। जया किशोरी जब कथावाचन करती हैं तो उन्हें सुनने के लिए हजारों की तादाद में लोग पहुंच जाते हैं। यही नहीं, सोशल मीडिया में भी जया किशोरी का कथावाचन बहुत ही लोकप्रिय है।

उन्हें फॉलो करने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। जया किशोरी का नाम इंडिया की फेमस कथावाचिका के रूप में जाना जाता है। सोशल मीडिया में हमेशा ही जया किशोरी के वीडियो को वायरल होते हुए देखा जाता है।

एक प्रवचन करने के इतने रुपये चार्ज लेती हैं जया किशोरी, फिर पैसों से करती हैं ऐसा काम

एक मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में भी जया किशोरी की पहचान है। इंटरनेट पर अक्सर यह सर्च किया जाता है कि जया किशोरी की फीस आखिर कितनी है और उनकी कथाओं पर होने वाला खर्च कितना है।

वे एक भजनगायिका भी हैं। सिर्फ भारत ही नहीं विदेशों में भी उनके सैकड़ों अनुयायी हैं। जया किशोरी के ऑफिस में काम करने वाले एक कर्मचारी की मानें तो एक कथा करने के लिए वे 9 लाख 50 हजार रुपये फीस के तौर पर ले लेती हैं।

कथा करने से पहले इस फीस का आधा हिस्सा यानी कि 4 लाख 25 हजार रुपये ले लिए जाते हैं। वहीं, बाकी फीस कथा करने के बाद ली जाती है।

एक प्रवचन करने के इतने रुपये चार्ज लेती हैं जया किशोरी, फिर पैसों से करती हैं ऐसा काम

जया किशोरी का जन्म 1996 में हुआ था। उनका असली नाम जया शर्मा है, लेकिन लोग उन्हें जया किशोरी के रूप में जानते हैं। ऐसा नहीं है कि जया किशोरी कथावाचन के बदले जो फीस लेती हैं, वे सारे पैसे केवल अपने लिए ही खर्च करती हैं।

इस कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा नारायण सेवा संस्थान को दान में चला जाता है। यह वह संस्थान है, जो दिव्यांग लोगों की सेवा में लगा हुआ है। विशेष तौर पर इसमें दिव्यांगों को आर्थिक मदद मुहैया कराई जाती है।

एक प्रवचन करने के इतने रुपये चार्ज लेती हैं जया किशोरी, फिर पैसों से करती हैं ऐसा काम

इन दिनों मोटिवेशनल स्पीकर और आध्यात्मिक वक्ता में जया किशोरी जी एक बड़ा नाम बन चुकी हैं। वे जब 9 वर्ष की थी तभी से आध्यात्म की ओर खींची चली आई थी।

जया किशोरी के मुताबिक वे कथावाचन में ज्यादा व्यस्त रहती हैं, ऐसे में उनके पास दिव्यांगों की मदद के लिए समय नहीं होता।

उनके मुताबिक वे दिव्यांगों की मदद के लिए पहुंच भी नहीं पाती हैं। यही वजह है कि वे दान करके ही दिव्यांगों तक अपने हिस्से की सेवा पहुंचा देती हैं।

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