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30 जून 1908 का दिन जब रूस के तांगुस्का में मच गई थी तबाही, जानें एस्टेरॉयड डे का इतिहास और महत्व

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एक शताब्दी पूर्व 30 जून 1908 में, 30 जून की सुबह रूस में तंगुस्का नदी के ऊपर एक एस्टेरॉयड पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश किया और लगभग 8.5 की उच़ाई पर एक भयंकर विस्फोट के साथ नष्ट हो गया। विस्फोट की शक्तिशाली तरंगों से 2100 वर्ग किलोमीटर इलाके के आठ करोड़ पेड़ गिर गए। स्थानीय लोगों ने इसे दैवीय आपदा माना, मगर वैज्ञानिकों के मुताबिक यह लगभग चालीस मीटर आकार का एक उल्का पिंड था जो पृथ्वी के वातावरण से गुजरते समय बेहद गर्म होकर फट गया था। कहा जाता है कि इस प्रक्रिया में सायाद 2.8 मेगा टन ऊर्जा फैली थी। यह खोगोलिय और अंतरिक्ष की दुनिया में तुंगुस्का इवेंट के नाम से विख्यात है और विश्व में इस दिन को वर्ल्ड एस्टेरॉयड डे के नाम से मनाया जाने लगा।

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उस दिन को कहा जाता है कि वो क़यामत की सुबह थी। लोगों ने धरती पर ही सूर्य के समान बेहद तेज़ चमकीली रोशनी देखी, दस मिनट बाद ज़ोरदार धमाके की आवाज आई, ये एक भीषण विस्फोट था। चस्मादिदों के मुताबिक ये इतना ज़ोरदार था कि ज़मीन किसी भूकंप के समान थर्रा उठी। सैकड़ों किलोमीटर दूर तक लोगों के घरों की खिड़कियां टूट गईं। ढाई हजार किलोमीटर की दायरे में आठ करोड़ पेड़ जड़ से उखड़ गए, ऐसा लगा मानो आसमान टूट पड़ा हो।

30 जून 1908 का दिन जब रूस के तांगुस्का में मच गई थी तबाही, जानें एस्टेरॉयड डे का इतिहास और महत्व

हर 100 साल में उल्का पिंडों के धरती से टकराने की 50 हजार संभावनाएं होती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक उल्का पिंड जैसे ही पृथ्वी के पास आता है तो जल जाता है। आजतक के इतिहास में बहुत कम मामले ऐसे हैं जब इतना बड़ा उल्का पिंड धरती से टकराया हो। धरती पर ये उल्का पिंड कई छोटे छोटे टुकड़ों में गिरते हैं।

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आकाश में कभी कभी एक ओर से दूसरी ओर जाते हुए, जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण भाषा में टूटते हुए तारे या लूका कहते हैं। उलकाओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुंचता है उसे उल्का पिंड कहते हैं। अक्सर रात में उल्काइएं देखी जा सकती हैं लेकिन इनमें से पृथ्वी पर गिरने वाले पिंडो की संख्या अल्प होती है।

Written by – Ansh Sharma

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