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चिड़िया का टूटा घोसला और अंडा देख,दो दोस्तों की दोस्ती ने 6 साल में उगाए 55 जंगल ,जानिए कैसे?

बहुत बार आपने पक्षियों के घोंसले में रखे हुए अंडों को गिरकर टूटते हुए देखा होगा, और आप उसको भूल भी जाते होंगे। पक्षियों के घोंसले दिन पर दिन कम होते जा रहे है ,सवाल तो किसी के मन में उठता ही नहीं है। हमने अपने स्वार्थ में जिस तरह से प्रकृति को बर्बाद किया है उसको फिर से आबाद करने के लिए कदम उठा सकते हैं और कुछ लोग कदम उठा भी रहे है।आज हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसी लोगो के बारे 10 साल पुराने दोस्त और दो व्यवसाई राधाकृष्णन नायर और दीपेंद्र जैन की जो पिछले 6 साल से जंगल उगाने की मुहिम चला रहे हैं।

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नायर और जैन पिछले 6 साल से मिलकर “मियावाकी तकनीक” से जंगल उगाने का काम कर रहे हैं मियावाकी तकनीक जापान की खेती तकनीक है जो,कम समय में घने जंगल विकसित करने के लिए काफी सफल है, और इन दोनों दोस्तों ने अब तक 9,00,000 पौधे लगाए हैं जो वृक्ष बन चुके हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए नायक ने बताया कि वो केरल से है, और शुरू से उनका परिवार कर्नाटक में रहता है। उसके बाद वह काम की तलाश में मुंबई चले गए और वहां से अपने कपड़े का व्यवसाय शुरू करने के लिए गुजरात के उमरगांव चले गए।वहीं दूसरी ओर दीपेंद्र जैन ने बताया कि उनका जन्म मुंबई में हुआ और वह एक व्यवसाई परिवार से है।

इन दोनों की मुलाकात व्यवसाय के चलते ही हुई। सामाजिक कार्य से जुड़े रहने वाले नायर ने बताया कि कई साल पहले उमरगांव में सड़कों को चौड़ा करने के लिए पेड़ काटा गया, उन्होंने इसे रोकने के लिए काफी मेहनत की लेकिन इसका कुछ फायदा नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि 1 दिनों अपने गाड़ी से जा रहे थे, तो देखा कि सड़क किनारे चिड़िया के अंडे नीचे फूटे पड़े और चिड़िया बार बार पेड़ पर जाती है और नीचे उन टूटो अंडो के पास आती है। उसके बाद इस घटना ने उनको बहुत प्रभावित किया।

नायर ने बताया कि इसके बाद इनकी बात दीपेन जैन से हुई। दीपेन ने बताया कि जब नायर ने मुझे बात बताइए तो उन्होंने भी इस बारे में सोचा। दीपेंन जैन ने बताया कि, उनको अपने व्यवसाय को लेकर बार-बार जापान जाना होता था, जहां मुझे अपने क्लाइंट से मियावाकी तकनीक के बारे में मालूम हुआ। जिसे हमने “सघन वन” नाम दिया। इसके बाद नायर और जैन ने मियावाकी संस्थान से संपर्क कर तकनीक सीखी और उनके लिए तकनीक को समझना और काम करना काफी आसान रहा ।

Lungs of Tararpur

इसके बाद इन दोनों ने उमरगांव में जमीन खरीदकर अपना एक मियावाकी जंगल लगाया, और मात्र दो से ढाई साल में ही यह जंगल अच्छे से पनप गया और इलाके में अच्छा पहचान दिला दिया। नायर ने बताया कि पहले से ही सामाजिक कार्य से जुड़े रहने के कारण स्कूल कॉलेज में अच्छी जान-पहचान थी उसके बाद स्कूल कॉलेज ने भी पेड़ पौधे लगाने का मौका दिया। इसके बाद उन्होंने एक “फॉरेस्ट क्रिएटर्स” नाम की संस्था बनाया,जो अब तक 12 राज्य में मियवाकी जंगल तैयार कर चुकी है।

Written By – Ankit Kunwar

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