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इंदिरा एकादशी: श्राद्धपक्ष में इस व्रत का है बहुत बड़ा महत्व, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

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इंदिरा एकादशी: श्राद्धपक्ष में इस व्रत का है बहुत बड़ा महत्व :- सितंबर का महीना जिसमें अभी पितृपक्ष चल रहा है। पितृपक्ष भादपद्र माह की पूर्णिमा तिथि से आरंभ होकर अश्विन मास की अमावस्या तक रहते हैं। पितृपक्ष 16 दिन के होते हैं। इस बार पितृपक्ष 2 सितंबर 2020 से शुरू होकर 17 सितंबर 2020 तक रहेंगे।

इसी के साथ आपको बता दे पितृपक्ष के दौरान कई बातों का ध्यान रखना पड़ता हैं। हिन्दू परंपरा के अनुसार पितृपक्ष की कई मान्यताएं है। पितृपक्ष में एक व्रत जो बहुत महत्वपूर्ण होता है। जिसका नाम इंदिरा एकादशी हैं। पितृ पक्ष में पड़ने वाले एकादशी के व्रत को इंदिरा एकादशी कहा जाता है।

इंदिरा एकादशी: श्राधपक्ष में इस व्रत का है बहुत बड़ा महत्व, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

यह व्रत बहुत ही खास माना जाता है। इंदिरा एकादशी का व्रत आश्विन मास के कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है।

इस बार यह तारीख 13 सितंबर यानी रविवार को पड़ रहा है। शास्त्रों में पितृ पक्ष के दौरान आने वाली इस एकादशी को पितरों को मोक्ष दिलाने वाली माना गया है। यदि आप इस व्रत का पुण्य पितरों को दान कर देते हैं, तो उनको भी मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इंदिरा एकादशी: श्राधपक्ष में इस व्रत का है बहुत बड़ा महत्व, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

वहीं महाभारत में इस व्रत का जिक्र किया गया है। इस व्रत के महत्‍व के बारे में स्‍वयं कृष्‍ण भगवान ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया जाता है। आइए आपको बताते हैं इस व्रत को रखने की विधि और अन्‍य खास बातें.
इंदिरा एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर नित्यक्रिया के बाद स्‍नान कर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें।

इंदिरा एकादशी: श्राधपक्ष में इस व्रत का है बहुत बड़ा महत्व, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

अब शालिग्राम को पंचामृत से स्‍नान कराकर वस्‍त्र पहनाएं। शालिग्राम की मूर्ति के सामने विधिपूर्वक श्राद्ध करें। धूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि से भगवान ऋषिकेश की पूजा करें। पात्र ब्राह्मण को फलाहारी भोजन कराएं और दक्षिणा देकर विदा करें।

इंदिरा एकादशी: श्राधपक्ष में इस व्रत का है बहुत बड़ा महत्व, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

इस दिन दिन भर व्रत करें और केवल एक ही बार भोजन ग्रहण करें। दोपहर के समय किसी पवित्र नदी में जाकर स्‍नान करें। पूरी रात जागरण करें और भजन गाएं। अगले दिन यानी कि द्वादश को सुबह भगवान की पूजा करें।
फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर उन्‍हें यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें। इसके बाद पूरे परिवार के साथ भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करे

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