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प्रेरणा : चार साल की उम्र में दोनों हाथ कटे तो मां-बाप ने छोड़ा साथ, अब पैरों से लिखी सफलता की दास्तां

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ईश्वर किसी को बहुत कुछ दे देता है तो किसी से सबकुछ छीन लेता है। इंसान को अपने बुरे वक्त में कभी हार नहीं माननी चाहिए। सुनील कुमार सिर्फ चार साल के थे जब एक हादसे ने उनके दोनों हाथ छीन लिए। मां-बाप को इस घड़ी में उनका साथ देना चाहिए था, लेकिन शायद बच्चे की पूरी जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने की हिम्मत उनमें नहीं थी। उन्होंने बच्चे को अस्पताल में उसकी किस्मत पर छोड़ दिया और वहां से चले गये।

उनके माता – पिता इस कठिनाई से लड़ने को तैयार नहीं थे। उन्हें उनकी किस्मत के हाल पर वहां छोड़ दिया गया। सुनील की किस्मत में दर-दर की ठोकरें खाने की बजाय कुछ और ही लिखा था। उनकी किस्मत ने उन्हें एक ऐसे आश्रम में पहुंचा दिया जहां ऐसे विशेष बच्चों को जीवन जीने की सीख दी जाती है। यहां सुनील ने अपने पैरों को हाथ बनाने का हुनर सीखा।

प्रेरणा : चार साल की उम्र में दोनों हाथ कटे तो मां-बाप ने छोड़ा साथ, अब पैरों से लिखी सफलता की दास्तां

हुनर ने उन्हें खुद की पहचान दिलाई। सभी के आज सुनील प्रेरणा बन गए हैं। उन्होंने पैरों की अँगुलियों से न सिर्फ अपने सामान्य कामकाज करना सीखा, बल्कि उन्हीं की मदद से पेंटिंग ब्रश पकड़ना भी शुरू कर दिया। आज वे पैर की अँगुलियों से वो काम कर रहे हैं जो करोड़ों सामान्य लोग भी नहीं कर पाते। अपनी अद्भुत सफलता से सुनील कुमार ऐसे लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं जो जिंदगी की परेशानियों के सामने हार मान लेते हैं और गलत राह अपना लेते हैं। 

प्रेरणा : चार साल की उम्र में दोनों हाथ कटे तो मां-बाप ने छोड़ा साथ, अब पैरों से लिखी सफलता की दास्तां

ईश्वर अगर कुछ छीन लेता है तो बहुत कुछ दे भी सकता है। हमें बस उस राह की तलाश करनी होती है जहां ईश्वर ने हमारे लिए कुछ रखा है। सुनील कुमार बताते हैं कि वे पंचकुला हरियाणा के आसपास कहीं रहते थे। एक दिन बिजली की चपेट में आकर वे बुरी तरह घायल हो गये। मां-बाप ने इलाज के लिए उन्हें चंडीगढ़ पीजीआई में भर्ती कराया, लेकिन बिजली की चपेट में बुरी तरह आ जाने के कारण उनके दोनों हाथों ने उनका साथ छोड़ दिया।

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सुनील की इस हालत पर एक महिला को उन पर दया आई। उन्हीं की मदद से वे मदर टेरेसा हरियाणा साकेत काउन्सिल परिषद में आये। यहीं उनकी जिंदगी ने आकार लेना शुरू कर दिया और आज इस मुकाम तक पहुंची है जहां उन्हें भी खुद पर गर्व महसूस होता है। तब से आज तक यही उनका ठिकाना है। अब सुनील कुमार अपने जैसे लोगों को प्रेरित करना चाहते हैं।

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